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Tuesday, 13 September 2016

ताँबा (Copper)


         

    खनिज तत्वों के ट्रेस तत्व (Trace Elements)

                 ताँबा (Copper)



शरीर में समस्त ऊतकों में ताँबे की अल्प मात्रा में उपस्थिति होती है। रक्त में उपस्थित ताँबा भोजन के साथ संयुक्त होकर हीमोक्यूपिन (Haemocuprin)के रूप में लाल रक्त कणिकाओं में रहता है। इसी प्रकार प्लाज्मा में सेरुलोप्लाज्मिन (Ceruloplasmin)के यौगिक के रूप में ताँबा उपस्थित रहता है। सामान्य स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में 100से 150 मिग्रा. ताँबे की उपस्थिति रहती है। 



मानव शरीर में ताँबे के कार्य -



1)- ताँबा हीमोग्लोबिन के निर्माण में एक उत्प्रेरक (Catalyst)के रूप में सहायक होता है। 
2)- शरीर में लोहे के अवशोषण व चयापचय में इसकी उपस्थिति अनिवार्य है। 
3)- फैटी एसिड के ऑक्सीकरण में सहायक होता है। 
4)- एस्कार्बिक एसिड (विटामिन 'सी ')के ऑक्सीकरण में सहायक है। 
5)- त्वचा को स्वाभाविक रंग प्रदान करने में इसकी उपस्थिति अनिवार्य है। ताँबे की कमी बालों को श्वेत रंग का बना देती है। 




ताँबे की प्राप्ति स्रोत -



ताँबे की उपस्थिति माँस,यकृत,अनाज,कुकुरमुत्ता,कॉफी,कोको व दूध में रहती है। माता के दूध की अपेक्षा गाय के दूध में इसकी मात्रा कम रहती है। ताँबे के बर्तन में भरा हुआ पानी पीने से भी इसकी मात्रा शरीर में पहुँचती है। 







Tuesday, 16 August 2016

लोहा (Iron)





                  खनिज तत्वों के ट्रेस तत्व (Trace Elements)  

                                       लोहा (Iron)


लोहे की उपस्थिति हमारे शरीर में बहुत कम मात्रा में आवश्यक होती हैं परन्तु इसकी उपस्थिति अत्यन्त अनिवार्य हैं। एक सामान्य स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में लगभग 4 ग्राम लोहा रहता है। शरीर में पाये जाने वाले लोहे का 70%भाग रक्त की हीमोग्लोबिन में,4%माँसपेशियों में,25%अस्थि मज्जा,यकृत वृक्कों व प्लीहा (spleen)में तथा 1%रक्ता प्लाज्मा तथा एन्जाइम में उपस्थित रहता है। 




शरीर में लोहे के कार्य :


1)- रक्त निर्माण का कार्य  


रक्त कणिकाओं में हीमोग्लोबिन एक आवश्यक भाग है ,जो लोहा (Haem)व ग्लोबिन (Globin)नामक प्रोटीन के संयोग से बनता है। लोहे की अधिकांश मात्रा इसी रूप में शरीर में उपस्थित रहती है। 


2)- शरीर में ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइ -ऑक्साइड का संवाहक -


लौह लवण का मुख्य जैविक कार्य ऑक्सीजन व कार्बन डाइ -ऑक्साइड का परिवहन करना है। 



लोहे की प्राप्ति के स्रोत -


अंडा,माँस ,मछली ,यकृत आदि लोहे के साधन हैं। फलों में सेव ,अनार ,आड़ू ,खुमानी ,किशमिश ,अँगूर ,मुनक्का आदि में लोहे की पर्याप्त मात्रा मिलती है। गाढ़े रंग के मीठे पदार्थ (Molasses)जैसे गुड़ ,खजूर ,मुनक्का आदि लोहे की प्राप्ति के अच्छे स्रोत हैं। विभिन्न गहरे हरे रंग की पत्तेदार सब्जियों में लोहे की प्रचुर मात्रा रहती है। अण्डे के पीले भाग में सफेद भाग की अपेक्षा अधिक लोहा रहता है। साबुत अनाज में ही पर्याप्त रहता है। दूध व पनीर में लोहे की मात्रा नगण्य ही रहती है। 

Sunday, 19 June 2016

सोडियम (Sodium) क्लोरीन (Chlorine) गन्धक (Sulphur)





                 खनिज तत्वों के मेजर तत्व (Major Elements)

                                सोडियम (Sodium)


इस खनिज लवण की पूर्ति आहार में यौगिक के रूप में सोडियम क्लोराइड (साधारण नमक )द्वारा की जाती है। सोडियम क्लोराइड या साधारण नमक सोडियम का एक यौगिक है। सामान्य स्वस्थ प्रौढ़ व्यक्ति के शरीर में 100 ग्राम सोडियम तत्व उपस्थित रहता है। शरीर की समस्त बाह्य कोशकीय द्रवों और प्लाज्मा आदि में यह उपस्थित रहता है। 


सोडियम के कार्य :


1)- सोडियम शरीर में अम्ल व क्षारीय स्थिति में सन्तुलन बनाये रखने में सहायक होता है। 
2)- शरीर के ऊतक द्रवों व प्लाज्मा के रसाकर्षण दबाब को नियन्त्रित करना है। शरीर में उचित जल सन्तुलन बनाये रखने में भी इसकी भूमिका रहती है। 
3)- ह्रदय की माँसपेशियों के संकुचन व नाड़ी ऊतकों की संवेदन शक्ति को नियमित रखता है। ह्रदय की धड़कन को सामान्य बनाये रखता है। 


सोडियम प्राप्ति के स्रोत :


सोडियम प्राप्ति का अच्छा स्रोत खाने का नमक है। गाजर,चुकन्दर,पालक ,दूध,पनीर,माँस,अण्डा में भी सोडियम अल्प मात्रा में रहती है। अनाजों में इसकी उपस्थिति अति अल्प मात्रा में रहती है। 


दैनिक आवश्यकता :


खाने का नमक सोडियम प्राप्ति का अच्छा साधन हैं।  प्राय : 2-6 ग्राम सोडियम की मात्रा हम अपने आहार में प्रतिदिन लेते हैं। 






                                           क्लोरीन (Chlorine)


शरीर में अम्ल व क्षार की स्थिति का सन्तुलन बनाये रखने में भी सहायक होता है। उचित शारीरिक बाढ़ की लिए भोजन में क्लोरीन की उपस्थिति अनिवार्य है। आमाशय से निकलने वाले हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का यह संगठन करता है। 
     प्रायः क्लोरीन की अधिकांश मात्रा भोजन में नमक के द्वारा ली जाती हैं।  जन्तु भोज्य पदार्थ जैसे -पनीर , अण्डा व सूअर के माँस में इसकी उपस्तिथि अधिक मात्रा में होती हैं।  वनस्पति फल व सब्जियों में यह काफी कम मात्रा में पाया जाता है। भोजन के द्वारा हम प्रतिदिन 3-8 ग्राम तक क्लोरीन क्लोरीन की मात्रा ग्रहण करते हैं। 





                                       गन्धक (Sulphur)


गन्धक त्वचा,बाल व नाखून के लिए महत्त्वपूर्ण होता है। 
      प्रोटीन युक्त आहार में गन्धक की प्राप्ति पर्याप्त मात्रा में हो जाती है। मूँगफली,पनीर व दालें आदि इसके अच्छे साधन हैं। 
       



Monday, 4 April 2016

मैग्नीशियम (Magnesium) पोटेशियम (Potassium)





                  खनिज तत्वों के मेजर तत्व (Major Elements)

                               मैग्नीशियम (Magnesium)



समस्त शरीर में पाये जाने वाले मैग्नीशियम का 70% भाग अस्थियों व दाँतो में तथा शेष भाग जल ऊत्तकों में प्रोटीन के साथ उपस्थित रहता हैं। एक सामान्य स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में लगभग 20-30 प्रतिशत तक मैग्नीशियम की उपस्थिति रहती हैं।  माँसपेशियों में मैग्नीशियम की उपस्थिति कैल्शियम से तीन ग्राम तक अधिक रहती हैं।  


मैग्नीशियम के कार्य :


1)- मैग्नीशियम शरीर की अनेक रासायनिक प्रतिक्रियाओं में महत्वपूर्ण योगदान देता हैं। कार्बोहायड्रेट व प्रोटीन चयापचय में महत्वपूर्ण कार्य करता हैं। 
2)- शरीर में कैल्शियम व फास्फोरस का उचित समन्वय बनाये रखने में मैग्नीशियम महत्वपूर्ण कार्य करता हैं। 
3)- माँसपेशियों व नाड़ी ऊतकों की शक्ति संबर्द्धन में सहायता करता हैं। 


मैग्नीशियम के प्राप्ति स्रोत :


दाल,अनाज,हरी सब्जियाँ,केला,खजूर आदि में मैग्नीशियम उपस्थित रहता हैं। दूध व दूध से बने पदार्थो में इसकी मात्रा काफी कम रहती हैं। 





                              पोटेशियम (Potassium)



पोटेशियम खनिज लवण की उपस्थिति अन्त: कोशिक्रिय द्रवों, लाल रक्त कणिकाओं व माँसपेशियों में रहती हैं। नित्य प्रति के आहार द्वारा इसकी 1.5-6.00ग्राम तक मात्रा लेना पर्याप्त रहता हैं। 


पोटेशियम के कार्य: 


पोटेशियम विशेष रूप से हृदय धड़कन की गति को नियमित रखने का कार्य करता हैं। माँसपेशियों के संकुचन,नाड़ी ऊतकों की संवेदन शक्ति बनाये रखने में पोटेशियम सहायक भूमिका निभाता हैं। 


पोटेशियम के प्राप्ति स्रोत:


दूध व दूध से बने पदार्थो में पोटेशियम तत्व पाया जाता हैं। रसदार फलों जैसे---नीबू,संतरा आदि में पोटेशियम तत्व उपस्थित रहते हैं। मक्का के आटे तथा चावल की ऊपरी पर्त में इसकी अल्प मात्रा रहती हैं। कुछ सब्जियों व फलों जैसे---खीरा,ककड़ी,टमाटर,आड़ू तथा अंगूर में भी यह पाया जाता हैं। आलू तथा आलू चिप्स में भी इस तत्व की उपस्थिति रहती हैं। 
   समस्त वनस्पति भोज्य पदार्थो में पोटेशियम उपस्थित रहता हैं। चाय,काफी,कोको,चावल की सफेदी में इसकी अधिकता होती हैं। 





Friday, 18 March 2016

फॉस्फोरस (Phosphorus)





खनिज तत्वों के मेजर तत्व (Major Elements)

               फॉस्फोरस (Phosphorus)


शरीर में खनिज तत्वों की कुल उपस्थिति का 1/4 भाग फॉस्फोरस का रहता हैं। प्रायः कैल्शियम तत्वों के बाद फॉस्फोरस की ही मात्रा अधिकतम होती है। फॉस्फोरस का अधिकतम 80% भाग हड्डियों व दाँतों में कैल्शियम के साथ ही पाया जाता है और शेष 20% भाग शरीर के कोमल व  तरल ऊतकों में रहता है। एक सामान्य स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में 400 से 700 ग्राम तक फॉस्फोरस की उपस्थिति एक फास्फेट के रूप में रहती है। 



फॉस्फोरस के कार्य :



1)-उच्च ऊर्जा बन्धकों (High Energy Bond )का निर्माण करने में सहायक। 
2)- अस्थियों व दाँतों के निर्माण में सहायक। 
3)- अम्ल व क्षार के सन्तुलन में नियन्त्रण। 
4)- आवश्यक शारीरिक यौगिकों का भाग। 
5)- पोषक तत्वों के अवशोषण व परिसंचरण में सहायक। 



फॉस्फोरस प्राप्ति के स्रोत :



वैसे तो कैल्शियम व फॉस्फोरस की उपस्थिति भोज्य पदार्थों में साथ ही साथ होती है,परन्तु फॉस्फोरस कैल्शियम की अपेक्षा खाद्य पदार्थों में आसानी से मिल जाता है। सामान्यतः शरीर में फॉस्फोरस का अभाव कम ही पाया जाता है। प्रोटीन युक्त आहार में फॉस्फोरस भी उपस्थित रहता है। फॉस्फोरस प्रोटीन के साथ संयुक्त होकर फास्फो प्रोटीन के रूप में दूध की प्रोटीन केसीन में उपस्थित रहता है। अण्डे के पीले भाग में न्यूक्लियो प्रोटीन में फॉस्फोरस की मात्रा रहती है। विभिन्न वसाओं में फोस्फोलिपिड और कार्बोहाइट्रेट में फोस्फोरिक एस्टर के रूप में यह उपस्थित रहता है। विभिन्न अनाज,दालों,महुए व तिल के बीजों में फाइटिन व फाइटिक एसिड के रूप में फॉस्फोरस उपस्थित रहता है। 
      फॉस्फोरस के उत्तम स्रोत हैं -दूध,पनीर,अण्डे की जर्दी,माँस,मछली,यकृत व साबुत अनाज आदि। यकृत में फॉस्फोरस अधिक मात्रा में पाया जाता है। बिना पालिश किये अनाजों की फॉस्फोरस फाइटिक एसिड के रूप में होने के कारण इसका पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता। फल व सब्जियों में फॉस्फोरस की कम मात्रा रहती है। 



Monday, 22 February 2016

कैल्शियम (Calcium)




खनिज तत्वों के मेजर तत्व (Major Elements)


             कैल्शियम (Calcium)



समस्त खनिज तत्वों में कैल्शियम की मात्रा सर्वाधिक होती है। शरीर भार का कुल 2%भाग कैल्शियम का बना होता हैं। सभी खनिज तत्वों की कुल मात्रा का आधा भाग अकेला कैल्शियम ही होता है। एक प्रौढ़ व्यक्ति के शरीर में कैल्शियम 1200 ग्राम तक होता है। कैल्शियम का 99%भाग शरीर के दाँत व अस्थियों को सुदृढ़ता प्रदान करने में तथा 1%भाग शरीर के तरल व कोमल ऊतकों को बनाने में व्यय होता है। इसके अतिरिक्त कैल्शियम की कुछ मात्रा पसीने द्वारा भी उत्सर्जित कर दी जाती है। 
            कैल्शियम की आवश्यकता होने पर शरीर में उपस्थित कैल्शियम के प्रत्येक अंश का शरीर भली भाँति प्रयोग करता है। स्वस्थ व्यक्ति की कैल्शियम अवशोषण क्षमता दुर्बल व्यक्ति की अपेक्षा अधिक रहती है। प्रायः बाल्यावस्था में 1 लीटर दूध की मात्रा अपेक्षित कैल्शियम की पूर्ति कर पाने में समर्थ होती है। 
             आहार नाल का अम्लीय माध्यम कैल्शियम अवशोषण में सहायक होता है। इसी तरह विटामिन 'डी ' व 'सी ' की उपस्थिति कैल्शियम अवशोषण की मात्रा को बढ़ा देते हैं। इसके विपरीत वसा व सैल्यूलोज रेशों की मात्रा,ऑक्जेलिक एसिड,फाइटिक एसिड आदि की मात्रा कैल्शियम अवशोषण में विघ्न पैदा करती है। ऑक्जेलिक एसिड कैल्शियम के साथ संयुक्त होकर कैल्शियम ऑक्जेलेट बनाता है जो अवशोषित नहीं हो पाता। पालक,चुकन्दर,कोको में ऑक्जेलिक एसिड उपस्थित रहता है। पालक कैल्शियम का अच्छा स्रोत है लेकिन फिर भी ऑक्जेलिक एसिड की उपस्थिति के कारण इसके कैल्शियम का उपयोग न के बराबर है इसी प्रकार फाइटिक एसिड जो अनाज के ऊपरी छिलकों में उपस्थित रहता है,कैल्शियम के साथ संयुक्त होकर अघुलनशील लवण बना देता है जिससे इसका अवशोषण नहीं हो पाता। 



कैल्शियम का अवशोषण तथा चयापचय 


कैल्शियम तत्व का अवशोषण छोटी आँत में होता है और रक्त परिवहन द्वारा शरीर विभिन्न भागों में इसकी पूर्ति की जाती है। शरीर में अतिरिक्त कैल्शियम हड्डियों में संग्रहित कर लिया जाता है और कैल्शियम की जब रक्त में मात्रा कम हो जाती है तो हड्डियों में से कैल्शियम निकल कर रक्त में आ जाता है,परन्तु दाँतों में प्रयुक्त कैल्शियम ज्यों का त्यों रहता है। वह स्थायी रूप से प्रयुक्त हो जाता है। हड्डियों में कैल्शियम लगातार आता -जाता रहता है। इसी कारण हड्डियों को 'कैल्शियम का भण्डार 'कहा जाता है। शरीर में पेराथायराइड ग्रन्थि (Parathyroid Gland)अपने हार्मोन द्वारा रक्त में कैल्शियम की मात्रा पर नियन्त्रण रखती है। पैराथायरॉइड हार्मोन रक्त में कैल्शियम की मात्रा 
9-11 मिग्रा /100 मि.ली.बनाये रखती है जो कैल्शियम अवशोषित नहीं हो पाता उसे मूत्र व मल द्वारा निष्कासित कर दिया जाता है। 



कैल्शियम के कार्य 

कैल्शियम शरीर में निम्नलिखित प्रमुख कार्य करता है -

1)- अस्थियों के निर्माण में सहायक 
2)- दाँतों के निर्माण में सहायक 
3)- रक्त का जमना 
4)- वृद्धि में सहायक 
5)- कार्बोहाइड्रेट,वसा व प्रोटीन के पाचन में प्रयुक्त क्रियाओं में उत्प्रेरक की भाँति कार्य 
6)- संवेदना प्रेषण में सहायक 
7)- कोशिका भित्ति की पारगम्य क्षमता को नियन्त्रित करना 
8)- हृदय स्पन्दन व माँसपेशियों की क्रियाओं के नियन्त्रण में सहायक 




कैल्शियम प्राप्ति के प्रमुख स्रोत 


कैल्शियम का प्रमुख स्रोत दूध है। यह दूध ताजा,मक्खन निकला,पाउडर तथा मट्ठा आदि के रूप में हो सकता है। दूध के बिना कैल्शियम की पूर्ति सम्भव नहीं। दूध में कैल्शियम अकार्बनिक लवण के रूप में मिलता है जो रक्त में शीघ्रता से अवशोषित हो जाती है। दूध का प्रति उत्तम प्रकार का होता है। कार्बोहाइट्रेट (लेक्टोज )भी शीघ्र पाचन योग्य होता है। सूखे दूध में विटामिन 'डी 'की भी उपस्थिति पायी जाती है। 

खाद्य -पदार्थ     

                                

1)- दूध एवं दूध से बनी वस्तुएँ 


गाय का ताजा दूध                                     
भैंस का ताजा दूध                                       
बकरी का ताजा दूध                                    
गाय के दूध का दही                                   
पनीर                                                      
भैंस के दूध का खोया                                

2)- अनाज 


रागी      
                                                 

3)-दालें                                                                                                               

                                      
मूँग की दाल                                        
अरहर की दाल                                     
चने की दाल
उरद की दाल                                        

4)- काष्ठफल और तेल वाले बीच 


तिल                                                 
बादाम                                               

5)- पत्ते वाली हरी सब्ज़ियाँ 


गाजर की पत्ती                                   
पुदीना                                              
करी की पत्ती                                    
संझना की पत्ती                               

6)- माँस 

सूखी हुई छोटी मछली                    





Monday, 8 February 2016

खनिज तत्वों के कार्य (BENEFITS OF MINERAL ELEMENTS)




खनिज तत्वों के कार्य :



खनिज तत्वों के शरीर निर्माणक कार्य (Constructive Work)


1)- दाँत व अस्थियों के निर्माण करने व उन्हें सुदृढ़ बनाए रखने में जैसे -कैल्शियम,फॉस्फोरस व मैग्नीशियम आदि तत्व। 
2)- कोमल ऊतकों के निर्माण में जैसे -फॉस्फोरस तथा गन्धक तत्व। 
3)- रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन के निर्माण में जैसे-लोहा,ताँबा व कैल्शियम भी रक्त के संगठन में सहायक होते हैं।
4)- थायरोक्सिन हार्मोन का निर्माण करने जैसे -आयोडीन। 


खनिज तत्वों के शरीर नियामक कार्य (Regulatory)


1)- कुछ खनिज तत्वों की प्रकृति अम्लीय होती है तथा कुछ की प्रकृति क्षारीय। इनके अम्लीय या क्षारीय होने के कारण ही ये शरीर में अम्ल व क्षार का सन्तुलन बनाए रखने में सहायक होते हैं। 
2)- कुछ खनिज तत्व जैसे -सोडियम,पोटेशियम,क्लोरीन आदि शरीर में जल की मात्रा में सन्तुलन बनाए रखते हैं। 
3)- कुछ खनिज तत्व माँसपेशीय तन्तुओं की संकुचन क्रिया में मदद करते हैं। 
4)- कुछ खनिज तत्व विभिन्न पोषक तत्वों के चयापचय को सुचारू रूप से संचालित करने में सहायक भूमिका निभाते हैं। 
5)- नाड़ियों की संवेदना शक्ति को सुचारू बनाए रखने का कार्य खनिज तत्वों का ही हैं। 

Wednesday, 3 February 2016

शरीर निर्माणक भोज्य तत्व -खनिज लवण (Body Building Nutrient-Mineral Elements)



शरीर निर्माणक भोज्य तत्व -खनिज लवण 

(Body Building Nutrient-Mineral Elements)


शरीर में जल,कार्बोहाइड्रेट,वसा व प्रोटीन के अतिरिक्त कुछ और अकार्बनिक तत्व भी सूक्ष्म मात्रा में उपस्थित रहते हैं जो मानव की विभिन्न चयापचयी (Metabolic)क्रियाओं में सहायक होते हैं जिन्हें खनिज लवण (Mineral Elements)कहा जाता हैं। यह शरीर में 4% भार की पूर्ति करते हैं तथापि शरीर में इनकी उपस्थिति बहुत अनिवार्य है। ये तत्व शरीर की वृद्धि व निर्माण की क्रियाओं में सहायक भूमिका अदा करते हैं। ये खनिज तत्व भूमि में उपस्थित होते हैं। मिट्टी में भी विभिन्न पादप वनस्पति उगते हैं जो जल के साथ ही इन लवणों को अपनी जड़ द्वारा भूमि से शोषित कर लेते हैं। जब जान्तव इन वनस्पतियों को खाते हैं तो ये खनिज लवण उनके शरीर में पहुँच जाते हैं। इस प्रकार भूमि से प्राप्त खनिज तत्व वनस्पति स्रोत से अन्ततः मानव शरीर में पहुँच जाते हैं जो मानव मृत्यु के साथ ही पुनः मिट्टी में आ जाते हैं। ये खनिज तत्व अकार्बनिक होते हैं,अर्थात इनमें कार्बन की उपस्थिति नहीं होती। 


विभिन्न प्रकार के खनिज लवण 


शरीर के लिए आवश्यक पाँच तत्व - कार्बोहाइट्रेट,वसा,प्रोटीन,विटामिन व जल की भाँति ये भी अनिवार्य व आवश्यक तत्व हैं। ये प्रायः शरीर की निर्माणी,स्वास्थ्य संबंधी व अन्य जीवनदायिनी क्रियाओं के संचालन में आवश्यक होते हैं। शरीर के लिए आवश्यक कुल 24 खनिज तत्वों की उपस्थिति का पता अभी तक लग पाया हैं। ये खनिज तत्व निम्नलिखित हैं। 

1-कैल्शियम 

2-फास्फोरस 

3-पोटेशियम 

4-सोडियम 

5-सल्फ़र (गन्धक )

6-मैग्नीशियम 

7-लोहा 

8-मैंग्नीज 

9-ताँबा 

10-आयोडीन 

11-कोबाल्ट 

12-जिंक (जस्ता )

13-एल्युमिनियम 

14-आसेंनिक 

15-ब्रोमीन 

16-क्लोरीन 

17-फ्लुओरिन 

18-निकिल 

19-क्रोमियम 

20-कैडमियम 

21-सैलेनियम 

22-सिलिकन 

23-मालिबॉडेनम 

24-क्लोराइड्स 



कुछ खनिज तत्वों की उपस्थिति शेष तत्वों से अधिक होती हैं जबकि कुछ खनिज तत्व न्यून मात्रा में आवश्यक होते हैं। कैल्शियम,फॉस्फोरस,पोटेशियम,क्लोरीन,सोडियम व मैग्नीशियम आदि ऐसे तत्व है जिनकी शरीर में अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है इसलिए इन्हें मेजर तत्व (Major Elements)कहा जाता है। जबकि कुछ तत्व जैसे -लोहा,ताँबा,मैग्नीज,आयोडीन आदि कम मात्रा में ही शरीर के लिए आवश्यक होते  है ये ट्रेस तत्व (Trace Elements)कहलाते हैं। शरीर में इनकी बहुत कम मात्रा आवश्यक होती है फिर भी इनके महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। इनकी उपस्थिति आवश्यक हैं। 



Thursday, 26 November 2015

वसा में घुलनशील विटामिन- विटामिन 'के '(Vitamin 'K')





वसा में घुलनशील विटामिन 

विटामिन 'के '



विटामिन 'के ' की खोज सर्वप्रथम डॉ. डेम (Dr. Dam)ने 1933 में की थी। उन्होंने प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया कि विटामिन 'के ' रक्त स्राव को रोककर रक्त का थक्का जमाने में सहायक होता है। इसी विशेषता के कारण इस विटामिन का नाम रक्त का थक्का जमाने वाला विटामिन (Coagulative Vitamin) या  (Antiheamorrhange Vitamin) भी रखा गया। 



विटामिन 'के 'की प्राप्ति के स्रोत :



विभिन्न वनस्पतियों जैसे गोभी,सोयाबीन,हरे पत्ते वाली सब्जियों में यह मुख्य रूप से पाया जाता हैं। जन्तुओं की आँत में उपस्थित कुछ बैक्टीरिया भी विटामिन 'के 'का निर्माण करते हैं। 



विटामिन 'के ' के कार्य :



इस जीवनसत्व का महत्त्वपूर्ण कार्य रक्त को जमाने की क्रिया (Coagulating of Blood)है। यह रक्त में पाया जाने वाला एक पदार्थ प्रोथ्रोम्बिन (Prothrombin)के संश्लेषण में सहायक होता है। प्रोथ्रोम्बिन थ्रोम्बिन में परिवर्तित होकर फाइब्रिन में बदल जाता है। जिसके कारण रक्त स्राव वाले स्थान पर महीन तन्तुओं का जाल -सा बन जाता है। यह बढ़ते हुए रक्त पर थक्का जमा देता है जिससे रिसते हुए रक्त के रास्ते में रूकावट आ जाती है और रक्त बहना बन्द हो जाता है। इसकी कमी से बहता हुआ रक्त रूकता नहीं है और अधिक समय तक बहता रहता है। 

Monday, 2 November 2015

वसा में घुलनशील विटामिन-विटामिन 'ई '(Vitamin'E')




वसा में घुलनशील विटामिन

विटामिन 'ई '


विटामिन 'ई ' मनुष्य व जन्तुओं में प्रजनन संस्थान की क्रियाशीलता हेतु आवश्यक होता हैं। 1922 में ईवान्स व विशप ने चूहों पर अनेक प्रयोग किये और देखा कि कच्ची सब्जियों के तेल में उपस्थित व वसा में घुलनशील यह तत्व चूहों की सन्तानोत्पत्ति में सहायक होता है। सन्तानोत्पत्ति में सहायक इस तत्व को विटामिन 'ई ' का नाम दिया गया। प्रजनन संस्थान के कार्यों को नियन्त्रित करने वाला यह विटामिन बाँझपन को दूर करता है। इसी विशेषता के कारण इसे बाँझपन विरोधी (Anti Sterlity Factor)के रूप में भी जाना जाता है। 



विटामिन 'ई ' प्राप्ति के स्रोत :


विभिन्न अनाजों के भ्रूण के तेल (जैसे -नारियल ,अलसी ,सरसों ,बिनौला )इसकी प्राप्ति के मुख्य साधन हैं। वनस्पति तेलों व वसाओं में इसकी अच्छी मात्रा उपस्थित रहती है। इसके अतिरिक्त यह विटामिन यकृत अण्डा ,अंकुरित ,अनाज ,माँस ,मक्खन में भी पाया जाता है। फल व सब्जियों में इसकी अल्प मात्रा रहती है। 


विटामिन 'ई 'के कार्य :


1)- यह विटामिन प्रजनन क्षमता को विकसित करता है। इसकी कमी से बाँझपन आता है। भ्रूण के विकास में यह विटामिन सहायक कार्य करता है। इसकी कमी से पुरूषों के शुक्राणु (Sperm)का बनना रूक जाता है तथा स्त्री के शरीर में भ्रूण गर्भ में ही मर जाते हैं। 
2)- विटामिन 'ई 'का एक कार्य इसकी ऑक्सीजन प्रतिरोधात्मकता के कारण है। यह विटामिन O2 शीघ्रता से शोषित करके आँखों में विटामिन 'ए 'का ऑक्सीकरण कम करता है। इस प्रकार विटामिन 'ए 'की बचत होती है। विटामिन 'ए 'असंतृप्त वसीय अम्लों का ऑक्सीकरण होने से रोकता है। जिससे चयापचय की गति नियन्त्रित बनी रहती है। 
3)- विटामिन 'ई 'लाल रक्त कणिकाओं के ऑक्सीकारक पदार्थों को टूटने -फूटने से रोकता है और उनकी जीवन अवधि बढ़ाता है।                                                      

Tuesday, 29 September 2015

वसा में घुलनशील विटामिन - विटामिन 'डी '(Vitamin 'D')






वसा में घुलनशील विटामिन 


       विटामिन 'डी '


1918 में सर्वप्रथम मैलनवाय (MELLONBY)ने पाया कि चूहों में रिकेट्स रोग की स्थिति में कॉड लिवर ऑयल का उपयोग लाभकारी होता हैं। मैकोलम (MECOLLUM)व उसके सहयोगियों ने अध्ययनों से निष्कर्ष निकाला कि यदि कॉड लिवर ऑयल से विटामिन 'ए 'की मात्रा नष्ट कर दी जाएँ तो भी रिकेट के उपचार में लाभ मिलता है। इससे निष्कर्ष निकला कि विटामिन 'ए 'रिकेट रोग का उपचार करने में सहायक नहीं हैं। रिकेट दूर करने वाले इस पदार्थ (Anti Rachetic Substance)को विटामिन 'डी ' नाम दिया गया। सूर्य की अल्ट्रावॉयलट किरणों के प्रभाव से शरीर में संश्लेषित हो सकने की क्षमता के कारण इसे धूप का विटामिन (Sun Shine Vitamin)
भी कहा जाता हैं। 




विटामिन 'डी ' प्राप्ति के स्रोत :


1)-वनस्पति से :



वनस्पति भोज्य पदार्थों में ये नहीं पाया जाता हैं। 


2)- जन्तुओं में :


यह विटामिन मुख्य रूप से मछली के यकृत के तेल में पाया जाता हैं इसके अतिरिक्त अण्डा,दूध,पनीर में भी इसकी प्राप्ति होती है। 
         विटामिन 'डी ' की कुछ मात्रा हमारे शरीर में धूप द्वारा भी पहुँचती रहती हैं। जब प्रकाश की अल्ट्रावॉयलट किरणें त्वचा में उपस्थित कॉलेस्ट्रोल पर पड़ती हैं तो विटामिन 'डी 'का निर्माण होता है। यही कारण है कि शिशुओं को उनकी माताएँ सुबह मालिश करके धूप में थोड़ी देर लिटा देती हैं। 



विटामिन 'डी ' के कार्य :


1)- विटामिन 'डी 'शरीर में कैल्शियम व फॉस्फोरस के आंत्र में शोषण को नियन्त्रित करता है। विटामिन 'डी 'की कमी से कैल्शियम व फॉस्फोरस का अवशोषण कम हो जाता है जिससे ये तत्व शरीर में मल पदार्थों के साथ उतसर्जित हो जाते हैं। 

2)-विटामिन 'डी 'रक्त में कैल्शियम व फॉस्फोरस की मात्रा नियन्त्रित करता है। अस्थियों में एकत्र कैल्शियम व फॉस्फोरस आवश्यकता पड़ने पर पुनः रक्त में मिल जाता है। विटामिन 'डी 'की कमी से अस्थियों का कैल्शियम व फॉस्फोरस रक्त में निकलने लगते है जिससे रक्त में इनकी मात्रा बढ़ जाती है। 

3)-शरीर की उचित वृद्धि हेतु विटामिन 'डी 'अत्यन्त ही महत्वपूर्ण तत्व है। 

4)- विटामिन 'डी 'मुख्य रूप से अस्थियों के निर्माण में मदद करता हैं। यह अस्थियों को दृढ़ता प्रदान करता है। अस्थियों में कैल्शियम फास्फेट के संग्रहण को नियन्त्रित करता है। इसकी कमी से अस्थियों में कैल्शियम फास्फेट ठीक रूप से संग्रहित नहीं हो पाता और अस्थियाँ मुलायम होकर टूटने लगती हैं। 

5)-विटामिन 'डी ' दाँतों के स्वस्थ विकास हेतु भी आवश्यक है। इसकी कमी से दाँतों के डेन्टीन व ऐनामेल का स्वास्थ्य प्रभावित होता है जिससे दाँत शीघ्र ही खराब हो जाते हैं। 

6)-विटामिन 'डी 'पैराथायराइड ग्रन्थि की क्रियाशीलता को नियन्त्रित करता है। 

7)-यह पेशी और तन्त्रिका तन्त्र को कार्यशील रखता है। 

8)-चेचक और काली खाँसी से बचाव करता है। 


Tuesday, 15 September 2015

वसा में घुलनशील विटामिन-विटामिन 'ए '(Vtamin'A')





वसा में घुलनशील विटामिन


विटामिन 'ए '


वसा में घुलनशील विटामिनों में सर्वप्रथम विटामिन 'ए 'की खोज हुई। यह मुख्यतः वनस्पति के हरे रंग क्लोरोफिल से संबंधित है। पीले फल व सब्जियों में पाया जाने वाला कैरटिनोयाड्स वर्णक विटामिन 'ए 'के लिए प्री-विटामिन है। इस विटामिन को रेटिनॉल (retinol)भी कहते हैं। इसे वनस्पतियों में में पाये जाने वाले पदार्थ कैरोटीन (Carotene)से प्राप्त किया जाता हैं। इसे विटामिन Aका प्रीकर्सर कहते हैं। 
          विटामिन A1का सबसे मुख्य स्रोत मछली के यकृत का तेल है। समुद्री मछलियों के यकृत में मुख्यतः विटामिन A1व मीठे पानी की मछलियों के यकृत में विटामिन A2होता हैं 


विटामिन 'ए 'प्राप्ति के साधन :


1)-वनस्पति से - 


वनस्पति से यह उन साग-सब्जियों में पाया जाता है जो पीले व लाल रंग के हों ;जैसे -टमाटर,गाजर,पपीता,शकरकंद,आम,आड़ू,मटर व हरी पत्तेदार सब्जियाँ (धनिया,शलजम,पोदीना,चुकंदर )आदि में। 


2)- जन्तुओं से -


मुख्य रूप से मछली के यकृत के तेल में मिलता हैं। इसके अतिरिक्त यह अण्डा,दूध व मक्खन आदि में पर्याप्त मात्रा में मिलता है। 
      वनस्पति घी का पौष्टिक मूल्य बढ़ाने के लिए उसमें ऊपर से विटामिन 'ए 'मिला दिया जाता हैं। 




विटामिन 'ए 'के कार्य -



1)- विटामिन 'ए 'आँखों की सामान्य दृष्टि के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं। यह नेत्रों में उपस्थित रोडोप्सिन (Rhodopsin or visual purple)नामक पदार्थ में प्रोटीन रहित भाग का निर्माण करता हैं। रोडोप्सिन की उपस्थिति सामान्य दृष्टि हेतु अत्यन्त आवश्यक है। विटामिन 'ए ' की अधिक समय तक कमी रहने से रात्रि अन्धापन (Night Blindness)हो जाता है। जिसमें व्यक्ति धीमे प्रकाश (dim night)में कुछ भी देखने में असमर्थ रहता है। 

2)-विटामिन 'ए 'एपिथीलियम ऊतकों की कार्यक्षमता व क्रियाशीलता बनाए रखने में भी सहायक होता हैं। यह श्लेष्मा स्त्राव में सहायक कारकों के निर्माण में सहायता करता हैं,जिससे कि ऊतकों की स्थिरता बनी रहती हैं। यह ऊतक जीभ,नेत्र,श्वसन नली,मुख गुहा,प्रजनन व मूत्र संबन्धी नलियों आदि की आन्तरिक भित्ति का निर्माण करते हैं। 

3)- विटामिन बाह्य त्वचा की कोशिकाओं को चिकना व कोमल बनाए रखती हैं। इसके अभाव में बाह्य त्वचा सूख जाती हैं व दरार पड़ जाती हैं। त्वचा में बाह्य संक्रमण से बचाव करने की क्षमता का ह्रास होता हैं। यह अवस्था ( Keratinnisation)की कहलाती हैं। 

4)- बालकों की सामान्य वृद्धि व विकास में यह वृद्धि वर्ध्दक कारक (Growth Promoting Factor)भाँति कार्य करता हैं। 
5)- विटामिन 'ए 'अस्थियों में दाँतों के विकास में योगदान देता हैं। इसकी कमी से अस्थियाँ लम्बाई में बढ़ना बन्द कर देती हैं। फलस्वरूप अस्थियों की वृद्धि रूक जाती है। विटामिन 'ए 'अपरिपक्व कोशिकाओं को आस्टियोब्लास्ट कोशिकाओं में परिवर्तित करने का कार्य करता है जो कि कोशिकाओं की संरचना बढ़ाता है। यह आस्टियोब्लास्ट के परिवर्तन में भी सहायक होता है जो हड्डी व कोशिकाओं के बढ़ने में सहायक है और वृद्धि काल में पुनः निर्मित की जाती हैं। 

6)- विटामिन 'ए 'की कमी से नेत्रों की बाहरी पर्त कार्निया मुलायम पड़ जाती हैं। इस रोग को कैराटोमलेशिया (Keratomalacia)कहते हैं। 





























Thursday, 3 September 2015

मुंबई पाव भाजी (Mumbai Pav Bhaji)













छः व्यक्तियों के लिए :


सामग्री :




ताजे पाव - 12 
आलू (उबले और मैश किए हुए )- 5 मध्यम 
मटर (उबली और मैश की हुई )- 1/4 कप 
फूल गोभी (कसी हुई )- 1/4 कप 
शिमला मिर्च (बारीक़ कटी )- 1 बड़ी 
प्याज (बारीक़ कटा )- 2 मध्यम 
अदरक पेस्ट - 1 छोटी चम्मच 
लहसुन पेस्ट - 1 1/2  छोटी चम्मच 
हरी मिर्च पेस्ट - 1 छोटी चम्मच 
टमाटर (बारीक़ कटे )- 5 मध्यम 
टमाटर प्यूरी - 1/2 कप 
नीबू का रस - 2 टेबलस्पून 
पाव भाजी मसाला - 3 टेबलस्पून 
नमक स्वादानुसार 
मक्खन - 6 टेबलस्पून 
तेल - 3 टेबलस्पून 





विधि :





1)- एक पैन में तेल और तीन टेबलस्पून मक्खन गरम करें,उसमें प्याज डालकर चार से पाँच मिनट तक मध्यम आँच पर भूने ,अदरक,लहसुन और हरी मिर्च पेस्ट डालकर एक मिनट तक भूने। 
2)- टमाटर डालकर चार से पाँच मिनट तक पकाएँ ,उसमें पाव भाजी मसाला और नमक डालकर एक मिनट तक भूने। मटर ,गोभी ,शिमला मिर्च और आलू डालकर मसाले में अच्छी तरह मिलाएँ ,आधा कप पानी डालें और ढक्क्न लगाकर मध्यम आँच पर सात मिनट तक पकाएँ। 

























3)- टमाटर प्यूरी डालकर अच्छी तरह मिलाएँ,ढक्क्न लगाकर चार मिनट तक पकने दें। नीबू का रस और मक्खन डालकर मिलाएँ और एक मिनट तक और पकाएँ। आँच बन्द कर दें। भाजी तैयार हैं। 











4)- नॉन स्टिक तवा गरम करें। पाव को बीच से काटें और मक्खन लगाकर दोनों तरफ से गुलाबी होनें तक सेंकें। 
5)- गरमागरम भाजी गरमागरम पाव के साथ सर्व करें। 















Friday, 14 August 2015

ड्राईफ्रूट्स के फायदे (Benefits Of Dry-fruits)











सदियों से मेवे का प्रयोग उत्तम औषधि के रूप में किया जाता हैं ,क्योंकि मेवा स्वाद की नहीं ,बल्कि सेहत की दृष्टि से भी उतना ही फायदेमंद हैं। मेवे में मौजूद तत्व शारीरिक विकारों को दूर कर ,शरीर को रोगों से लड़ने की शक्ति भी प्रदान करते हैं। 
        अक्सर लोग वज़न बढ़ने के डर से मेवे का सेवन करने से बचते हैं,क्योंकि मेवे में हाई कैलोरीज़ और फैट्स होते हैं ,जबकि सच्चाई यह है कि मेवे सेहत के लिए काफ़ी फायदेमंद होते है ,विशेषज्ञों का मानना है कि मेवे कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियन्त्रित कर शरीर को बीमारियों से बचाते हैं। आइए जाने सेहत की दृष्टि से मेवे कितने लाभकारी हैं ,




                                          अखरोट



1)- अखरोट ओमेगा -3 एसेंशियल फैटी एसिड का एक उत्तम स्रोत हैं इसलिए यह कार्डियो वेस्कुलर हेल्थ ,अस्थमा ,आर्थराइटिस ,एक्ज़िमा तथा सोराइसिस में भी लाभदायक है। 

2)-अखरोट प्रोटीन ,फाइबर ,आयरन ,मैग्रेशियम ,फॉस्फोरस ,कॉपर व मैगनीज का बढ़िया स्रोत है। 

3)- अखरोट में निहित इलेनिक एसिड एक एंटीऑक्सीडेंट है ,जो इम्यून सिस्टम को बेहतर बनाता है ,इसके एंटी कैंसर गुण कैंसर से लड़ने की क्षमता प्रदान करते हैं। 

4)-इसका नियमित सेवन अल्ज़ाइमर से बचाव करता है और ब्लड क्लॉटिंग को रोकता है। 

5)- अखरोट का सेवन महिलाओं में होने वाली गाल स्टोन की समस्या में भी फ़ायदेमंद होता है। 

6)- अखरोट में मौजूद मेलाटोटिन तत्व एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है ,जो अच्छी नींद में सहायक हैं ,जिन लोगों को अनिद्रा की समस्या होती है ,उन्हें सोने से पहले अखरोट खाना चाहिए। 





                                               काजू 




1)- काजू में ओलिक एसिड होता है ,जो हार्ट फ्रेंडली तत्व है। 

2)- इसमें 75% अनसैचुरेटेड फैटी एसिड होता है ,जो हृदय के लिए अच्छा होता है। 

3)- गाल ब्लेडर में स्टोन के खतरे को कम करने के लिए काजू का सेवन करना चाहिए। 

4)- काजू का सेवन हड्डियों को मज़बूती प्रदान करता है ,क्योंकि इनमें मैग्रेशियम व कॉपर मौजूद होता है। 

5)- काजू का सेवन फ्री रेडिकल्स को दूर करने तथा मेलानिन का निर्माण करने में लाभदायक है। 

6)- कॉपर व आयरन बोन्स व कनेक्टिव टिशू (हड्डियों व योजक टिशू )को विकसित करने में सहायक होता है। 




                                            बादाम



1)-बादाम में आयरन ,कॉपर ,फॉस्फोरस तथा विटामिन बी -1 होते है ,जो नए ब्लड सेल्स तथा हीमोग्लोबिन के निर्माण में सहायक होते है ,ये शारीरिक अंगों की सही संचालन क्रिया में भी सहायक होते हैं। 

2)- बादाम कब्ज़ व कोलोन कैंसर की रोकथाम में भी लाभकारी है। 

3)- बादाम में मौजूद कैल्शियम तथा मैग्रेशियम हड्डियों को मज़बूती प्रदान करता है। 

4)- लो कैलोरी डायट के साथ बादाम का सेवन करने से वज़न कम होता है।

5)- कार्डियो वेस्कुलर हेल्थ के लिए बादाम बहुत लाभदायक है। 

6)- हाई ब्लड शुगर को नियन्त्रित करने में बादाम सहायक होता है। 

7)-  बादाम में विटामिन 'ई 'होता है ,इसे पैक के रूप में लगाने से त्वचा नर्म -मुलायम बनती है और पिंपल ,रिंकल व ड्राईनेस की समस्या कम होती है। 

8)- बादाम का नियमित सेवन ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करता है। 

9)- इसमें निहित सेलेनियम तत्व एजिंग प्रोसेस की गति को धीमी करता है। 

10)- प्रेग्रेंसी के दौरान बादाम का सेवन करने से गर्भस्थ शिशु में होनेवाले 
जन्म विकार का खतरा कम हो जाता है। 

11)- बादाम को भिगोकर खाना चाहिए ,भिगोए हुए बादाम आसानी से पच जाते है। 




                                               पिस्ता  



1)- पिस्ते का सेवन कोरोनरी आर्टरी रोग व हार्ट अटैक से बचाव करता है तथा अच्छे व खराब रक्त का संतुलन बनाने में सहायक होता है। 

2)- पिस्ते में एंटीऑक्सीडेंट अधिक मात्रा में होते हैं ,जो तनाव को कम करते है तथा इसमें मौजूद विटामिन्स व मिनरल्स आँखों की सेहत के लिए लाभकारी हैं। 

3)- मसाज थेरेपी ,एरोमा थेरेपी तथा कॉस्मेटिक इंड़स्ट्री में प्रयोग की जाने वाली दवाइयों में इसका इस्तेमाल होता है। 

4)- पिस्ते में मौजूद फ़ाइबर ब्लड शुगर के स्तर को नियन्त्रित करता है। 

5)- पिस्ते में मौजूद कैल्शियम हड्डियों को मज़बूती प्रदान करता हैं तथा स्नायु की क्रिया को संतुलित रखता हैं। 

6)- पिस्ते में मौजूद आयरन ,हीमोग्लोबिन का निर्माण करने में सहायक होता है। 

7)- पिस्ते में प्रोटीन ,फैट्स व फाइबर्स अधिक मात्रा में होते है। 




                                         किशमिश 



1)- किशमिश आयरन का अच्छा स्रोत है ,अतः खून की कमी एनीमिया व कब्ज दूर करने में बहुत फायदेमंद हैं। 

2)- किसी भी बीमारी के बाद रिकवरी पीरियड में किशमिश का सेवन लाभप्रद हैं। 

3)- किशमिश में मौजूद ओलेनॉटिक एसिड दाँतों व मसूड़ों के रोगों से बचाव करता है और दाँतों पर जमे प्लाक से उत्पन्न होने वाले बैक्टीरिया को ख़त्म करता है। 

4)- किशमिश फाइबर्स का बढ़िया स्रोत होने के कारण कॉलेस्ट्रॉल कम करने में सहायक होता है। 

5)- किशमिश में कैल्शियम होता हैं ,जो हड्डियों के लिए फ़ायदेमंद है। 
















Thursday, 6 August 2015

इटालियन पास्ता बीन सलाद (Italian Pasta Beans Salad)











सामग्री :




पास्ता (कोई भी आकार का उबला हुआ )-1 कप 
राजमा (उबले हुए )- 1 कप 
स्वीट कॉर्न - 1/2 कप 
टमाटर (बारीक़ कटे )- 1/2 कप 
शिमला मिर्च (बारीक़ कटी )- 1/2 कप 
पत्ता गोभी (बारीक़ कटी )- 1/2 कप 
पास्ता या पिज़्ज़ा सॉस - 2 टेबलस्पून 
एगलेस मेयोनीज - 2 टेबलस्पून 
नमक स्वादानुसार 
काली मिर्च पाउडर - 1/4 छोटी चम्मच 
दूध - 2 टेबलस्पून 





विधि :



1)- एक बाउल लें उसमें पास्ता और राजमा डालकर मिलाएँ। अब उसमें स्वीट कॉर्न ,टमाटर ,शिमला मिर्च और पत्ता गोभी डालें और अच्छी तरह मिलाएँ। 
2)- अब उसमें मेयोनीज ,पिज़्ज़ा सॉस ,काली मिर्च ,नमक और दूध डालकर अच्छी तरह मिला लें।  रेफ्रिजरेटर में पन्द्रह मिनट के लिए रखें। 
3)- रेफ्रिजरेटर से बाहर निकाल कर अपनी पसन्द के चिप्स के साथ सर्व करें। 












Monday, 27 July 2015

काली मिर्च चिकन विद अनियन रिंग्स (Kali Mirch Chicken With Onion Rings)











सामग्री :



चिकन - 1/2 किलो 
गाढ़ा दही - 2 टेबलस्पून 
अदरक -लहसुन पेस्ट - 1 छोटी चम्मच 
सोया सॉस - 1 टेबलस्पून 
काली मिर्च (कुटी हुई )- 1 छोटी चम्मच 
प्याज रिंग्स - 2 कप 
तेल - 3 टेबलस्पून 
नीबू का रस - 1 टेबलस्पून 
चाट -मसाला - 1 छोटी चम्मच 
नमक स्वादानुसार 




विधि :




1)- एक बर्तन में चिकन ,दही ,अदरक -लहसुन पेस्ट ,सोया सॉस ,काली मिर्च और नमक को अच्छी तरह मिलाएँ और आधा घंटे के लिए अलग रख दें। 
2)- एक नॉन स्टिक पैन लें। उसमें दो टेबलस्पून तेल गरम करें उसमें प्याज रिंग्स डालें और तीन से चार मिनट तक भूनें। उसमें नीबू का रस ,नमक और चाट मसाला डालें और अच्छी तरह मिलाएँ। आँच बन्द कर दें। 3)- नॉन स्टिक पैन में एक टेबलस्पून तेल डालकर गरम करें उसमें मेरीनटेड चिकन डालें तेज आँच पर दो मिनट तक भूने। पैन में ढक्क्न लगाएँ और धीमी आँच पर पाँच मिनट तक पकाएँ। ढक्क्न खोलें आँच तेज करें। चिकन को तीन से चार मिनट तक भूने। प्याज रिंग्स डालें। (थोड़े रिंग्स ऊपर से सजाने के लिए रख लें। )अच्छी तरह मिलाएँ आँच बन्द कर दें 
4)- प्लेट में चिकन डालें और प्याज रिंग्स से सजा कर गरमागरम चिकन सर्व करें। 












Monday, 20 July 2015

चीज़ कॉर्न बॉल्स (Cheese Corn Balls )










सामग्री :



स्वीट कॉर्न - 1 कप 
पनीर (कसा हुआ )- 1 कप 
मोज़्ज़ारेल्ला चीज़ (कसा हुआ )- 1 कप 
मैदा - 1/4 कप 
कॉर्नफ्लोर - 2 टेबलस्पून 
हरी मिर्च (बारीक़ कटी )-2 
हरा धनिया (बारीक़ कटा )- 1/4 कप 
ब्रेड का चूरा - 1 कप 
नमक स्वादानुसार 
दूध - 1/4 कप 
तेल - तलने के लिए 


विधि :


1)- स्वीट कॉर्न के दानों को पाँच मिनट तक उबाल कर छान ले और ठंडा कर लें। मिक्सर जार में डालकर पीस कर पेस्ट बना लें और अलग रख लें। 
2)- एक बाउल में कॉर्न पेस्ट ,पनीर ,चीज़ ,मैदा ,कॉर्नफ्लोर ,हरी मिर्च ,हरा धनिया और नमक डालकर अच्छी तरह से मिला लें और मिश्रण तैयार कर लें। 
3)- सारे मिश्रण से छोटे -छोटे बॉल्स बना लें और फ्रिज में बीस मिनट तक रख दें। 







4)- बॉल्स फ्रिज से निकाले। दूध में डुबोए और ब्रेड के चूरे में अच्छी तरह लपेट लें। इसे फ्रिज में फिर से बीस मिनट तक रखें। 









5)- पैन में तेल गरम करें। बॉल्स को फ्रिज से निकाल कर दो मिनट तक ऐसे ही रखें। जब तेल गरम हो जाएं तो बॉल्स को गोल्ड़न ब्राउन होने तक तल लें। बॉल्स को ज्यादा तेज आँच पर न तलें। मध्यम आँच पर ही तलें। 
6)- गरमागरम चीज़ कॉर्न बॉल्स अपनी पसन्द की चटनी के साथ परोसे। 














Sunday, 12 July 2015

फायदे नीबू के (Benefits OF Lemon )










नीबू एक ऐसा फल है जिसकी खूशबू मात्र से ही ताजगी का एहसास होता है। चाट हो या दाल कोई भी व्यंजन इस के प्रयोग से स्वादिष्ट हो जाता है। यह फल खट्टा होने के साथ -साथ बेहद गुणकारी भी है तो जाने नीबू के फायदे। 




1)- नीबू के पत्तों का रस निकाल कर अच्छी तरह सूँघे। सिरदर्द में आराम मिलता है। जिस व्यक्ति को हमेशा सिरदर्द बना रहता है ,उसे भी इससे शीघ्र आराम मिलता है। 

2)- दस ग्राम नीबू का रस ,दस बूँदे ग्लिसरीन तथा दस ग्राम गुलाबजल को मिलाकर रख लें। इस लोशन को प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद तथा रात को सोने से पहले चेहरे पर हल्के -हल्के मलने से चेहरा कोमल बन जायेगा। 
        नीबू के रस में बराबर मात्रा में गुलाबजल मिलाकर चेहरे पर लगाएं। आधे घंटे बाद ताजे पानी से धो लें। चेहरे के मुंहासे बिल्कुल साफ़ हो जाएँगे यह प्रयोग करीब दस से पन्द्रह दिनों तक करें। 

3)- दस ग्राम नीबू के पत्तों के रस (अर्क )में दस ग्राम शहद मिला कर पीने से दस -पन्द्रह दिनों में पेट के कीड़े मर जाते है। नीबू के बीजों के चूर्ण की फंकी लेने से भी कीड़े मर जाते है। 

4)- नीबू के रस में थोड़ा सेंहुड़ का दूध मिला कर मुँह में लगाने से जीभ के सभी विकार मिट जाते है। 

5)- नीबू के रस में दोगुना नारियल का तेल मिला कर हलके हाथों से सिर की मालिश करने से बाल झड़ना बंद हो जाते हैं व वे मुलायम भी हो जाते है साथ ही रूसी से भी मुक्त हो जाते है ,यदि सिर में रूसी हो ,तो नीबू के रस में नारियल का तेल मिला कर रात को सिर में मलें और सुबह कुनकुने पानी और रीठे के पानी से सिर को धोएं ,दो -चार बार यह क्रिया करने से खुश्की खत्म हो जाती हैं। 

6)- नीबू का रस व शहद मिला कर मसूड़ों पर मलते रहने से रक्त व पीप आना बंद हो जाते है। 

7)- दाँत दर्द होने पर नीबू को चार टुकड़ों में काट लीजिए ,इस के बाद ऊपर से नमक डाल कर सभी टुकड़े गरम कीजिए ,फिर एक -एक टुकड़ा दाँत व दाढ़ में रख कर दबाते जाएं व चूसते जाएं ,दर्द में राहत महसूस होगी। मसूड़े फूलने पर नीबू को पानी में निचोड़ कर कुल्ले करने से अत्यधिक लाभ होगा। 

8)- नीबू के रस व सरसों के तेल को मिला कर मंजन करने से दाँतों की चमक निखर जाएगी। 

9)- एक चम्मच नीबू का रस व शहद मिला कर पीने से हिचकी बंद हो जाएगी। इस प्रयोग में स्वादानुसार कालानमक भी मिलाया जा सकता हैं। 

10)- नीबू में फिटकरी का चूर्ण मिला कर खुजली वाले स्थान पर रगड़ें। खुजली समाप्त हो जाएगी। 

11)- नीबू के रस को दर्द वाले स्थान पर मलने से जोड़ों का दर्द व सूजन समाप्त हो जाएगी। 

12)- नीबू के रस में शहद मिला कर चाटने से सांस फूलने में काफी राहत महसूस होगी।